प्रकृति का मनुष्य जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है जिसे हमारे यहाँ यत-पिण्डे तत-ब्रह्माण्डे कहा गया अर्थात जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस पिंड अर्थात हमारे शरीर के भीतर है | ब्रह्माण्ड में होने वाली घटनाओं का असर इस पिण्ड अर्थात मनुष्य शरीर पर भी होता है | प्रत्येक मनुष्य इन प्राकृतिक घटनाओं के प्रभावों के वैज्ञानिक पक्ष का चिंतन कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता इसीलिए प्राचीन भारतीय ऋषि- मुनियों ने इन घटनाओं को उत्सव रूप में समाज में प्रचलित किया |
ऐसे ही प्रमुख उत्सवों में से एक है मकर संक्रांति |यह पर्व हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है और इसे सम्पूर्ण भारत और नेपाल के सभी प्रान्तों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस पर्व को 'मकर सक्रान्ति, पंजाब में लोहडी, गढ़वाल में खिचडी संक्रान्ति,गुजरात में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, जबकि कर्नाटक,केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति कहते हैं।
संक्रान्ति का अर्थ है, 'सूर्य का एक राशि से अnगली राशि में संक्रमण (जाना)'। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति के बीच का समय ही सौर मास है। संक्रांति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है – “रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते”। इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल 12 संक्रान्तियां होती हैं| पौष मास में सूर्य के नवम् धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण को मकर संक्रान्ति के रूप में जाना जाता है।
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
सामान्यतः सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। सर्वविदित है कि पृथ्वी की धुरी 23.5 अंश झुकी होने के कारण सूर्य छः माह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के निकट होता है और शेष छः माह दक्षिणी गोलार्द्ध के निकट होता है।मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध के निकट होता है अर्थात् उत्तरी गोलार्ध से अपेक्षाकृत दूर होता है जिससे उत्तरी गोलार्ध में रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से उत्तरी गोलार्ध में रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा सर्दी की ठिठुरन कम होने लगती है। अतः मकर संक्रान्ति अन्धकार की कमी और प्रकाश की वृद्धि की शुरुआत है।
वास्तव में मनुष्य, प्राणी-जगत, वनस्पति-जगत सहित सभी जीवधारी प्रकाश चाहते हैं और मकर संक्रमण के साथ ही सम्पूर्ण संसार सुषुप्ति से जाग्रति की ओर अग्रसर होता है। प्रकाश की अधिकता सभी प्राणियों की चेतना और कार्यशक्ति को बढ़ाने वाली होती है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। चरक संहिता स्पष्ट करती है-
रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति”
इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेल, तिल-गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं।
आयुर्वेद में तिल को कफ नाशक, पुष्टिवर्धक और तीव्र असर कारक औषधि के रूप में जाना जाता है। यह स्वभाव से गर्म होता है इसलिए इसे सर्दियों में मिठाई के रूप में खाया जाता है। गजक, रेवड़ियां और लड्डू शीतऋतु में ऊष्मा प्रदान करते हैं।
इस मौसम में सुबह का सूर्य का प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थ्य वर्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है । अतः पतंग उड़ाने का एक उद्देश्य कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना भी है।
मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, देवताओं के दिन की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है। दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है।
भगवद् गीता के अध्याय ८ में भगवान कृष्ण कहते हैं कि उत्तरायण के छह माह में देह त्याग करने वाले ब्रह्म गति को प्राप्त होते हैं जबकि और दक्षिणायन के छह माह में देह त्याग करने वाले संसार में वापिस आकर जन्म मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ৷৷
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ৷৷
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः” ৷৷
संभवत: सूर्य के उत्तरायण के इस महत्व के कारण ही भीष्म पितामह ने अपने प्राण तब तक नहीं छोड़े, जब तक मकर संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायन स्थिति नहीं आ गई ।रामचरित् मानस के बालकाण्ड में श्री राम के पतंग उड़ाने का वर्णन है-
'राम इक दिन चंग उड़ाई, इन्द्र लोक में पहुंची जाई।'
बड़ा ही रोचक प्रसंग है। पंपापुर से हनुमान जी को बुलवाया गया था, तब हनुमान जी बाल रूप में थे। जब वे आए, तब 'मकर संक्रांति' का पर्व था, संभवतः इसीलिए भारत के अनेक नगरों में मकर संक्रांति को पतंग उड़ाने की परम्परा है।
मकर संक्रांति का सामाजिक सन्देश
प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और अंधकार अज्ञान का इसीलिए तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर काम,क्रोध,मद,मोह,अहंकार,ईर्ष्
v तिल का अपने आप में अस्तित्व लगभग नगण्य होता है लेकिन ये तिल गुड़ के साथ गुथ कर जब लड्डू का स्वरुप लेता है तो स्वाद के साथ उसकी शक्ति भी बढती है उसी प्रकार अलग–अलग जाति, मत, पंथ, सम्प्रदायों में विभक्त भारतीय समाज यदि शुद्ध राष्ट्रभक्ति रूपी गुड़ से आपस में संगठित रहता है तो विश्व की अजेय शक्ति (अजय्याय च विश्वस्य) निर्मित हो सकेगी।
v महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं - "लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला" अर्थात् तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो ।
v इस दिन समाज में दान देने की परम्परा भी है जो सत्वगुण को व्यक्ति और समाज के भीतर जाग्रत करती है| पाश्चात्य जगत के प्रभाव में जहाँ चारों ओर स्वयं के भोग के लिए मांगने, आवश्यकता से अधिक एकत्र करने,संसाधनों पर एकाधिकार करने की मानसिकता संवेदनशील मानवता को निगलती दिखती है वहीँ मकर संक्रमण अपने प्राचीन आदर्श तेन त्यक्तेन भुंजीथा: अर्थात त्याग पूर्वक उपभोग को आज भी मानवता के हित में चिरजीवी बनाये हुए है |मकर संक्रांति न केवल भारत राष्ट्र का बल्कि सम्पूर्ण मानवता का उत्सव है। विश्व की 90% आबादी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ही निवास करती है अतः मकर संक्रांति पर्व न केवल भारत के लिए बल्कि लगभग पूरी मानव जाति के लिए उल्लास का दिन है। यद्यपि मकर संक्रांति सम्पूर्ण मानवता के उल्लास का पर्व है पर इसका उत्सव केवल हिन्दु समाज मनाता है क्योंकि भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व के मंगल और निरोग की कामना करता आया है।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्”
सब सुखी हों, सब निरोग रहें। सब अच्छी घटनाओं को देखने वाले अर्थात् साक्षी रहें और कभी किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े। वृहदारण्यक उपनिषद् के श्लोक के साथ आप सभी को मकर संक्रमण की हार्दिक शुभेच्छा ...
✍- भूपेन्द्र उबाना