Thursday, November 17, 2022

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर बढ़ता भारत : हमारी भूमिका

 

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर बढ़ता भारत : हमारी भूमिका

भारत ने इस वर्ष अपना 75वां स्वाधीनता दिवस मनाया | सामान्यतया 75वी वर्षगांठ को हीरक जयंती के नाम से जाना जाता है लेकिन भारत सरकार ने अपने स्वराज के 75वे वर्ष के आयोजन को अमृत महोत्सव का नाम दिया है इसकी गहनता को प्रत्येक भारतीय ने समझना चाहिए |

अमृत क्या हैजिसे पाकर व्यक्ति अमर हो जाये, लेकिन जब हम स्वराज़ के अमृत महोत्सव की बात करते है तो हम इस सत्य को स्वीकार करते है की जिस प्रकार का स्वराज हमने 1947 में प्राप्त किया ऐसा स्वराज विगत 1000वर्षों में भारत कई बार प्राप्त किया और खोया | एक राष्ट्र के रूप में हम दुनिया की बर्बरतम और क्रूर जातियों से सतत संघर्ष किये और स्वराज पाए | शकों को परास्त कर विक्रमी संवत की स्थापना से लेकर मुगलों को धुल चटाकर शिवाजी द्वारा हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना करना ये सभी स्वराज की प्राप्ति के बारम्बार उदाहरण है किन्तु वह सत्य जिसे हम भूले या भुलाने के षड्यंत्र किये गए की हम बार-बार अपने स्वराज को खोये ही क्यों और वो क्या बाते हैं जो आज प्राप्त स्वराज को अमरत्व प्रदान करेगी....

अमृत महोत्सव से प्रारंभ हुई अगले  25वर्षों की इस यात्रा में जो भारत के अमृतकाल की यात्रा है वास्तव में प्रत्येक भारतीय के हृदय में उपरोक्त विमर्श को स्पष्टतः स्थापित करने पर ही अपना अभीष्ठ प्राप्त कर पायेगी |

संयोग से जिस समय भारत अपने स्वराज के अमृत महोत्सव से अमृतकाल की यात्रा में प्रवेश कर रहा है उसी समय भारत के परम वैभव के लक्ष्य को प्रतिदिन स्मरण करते हुए इसके लिए शक्ति संचय में लगा विचार भी २०२५ में शतायु होने जा रहा है | ऐसे समय में भारत को नेतृत्व देने वाले माननीय प्रधानमंत्री जी एवं संघ को नेतृत्व देने वाले पूजनीय सरसंघचालक जी उद्बोधनों से प्राप्त पाथेय भारत के वैभवपूर्ण अमृतकाल की इस यात्रा पर चलने वाले प्रत्येक राष्ट्रभक्त पथिक के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है |

इसलिए आवश्यकता है उनके द्वारा मिली सांकेतिक दिशा को समझने की और परम वैभव सम्पन्न भारत की चाह मे बढने वाले कदमों की गति को बढ़ाने की । विगत कुछ वर्षों में समय-समय पर दोनों मनुभावों द्वारा दिए गए भाषणों और उद्बोधनों से अमृतकाल में भारत के स्वराज और वैभव के लिए जिस अमृत की चाह हमें है उनके प्राकट्य के लिए आवश्यक बाते कही गयी है इनको ध्यान से सुनने के बाद मेरी बुद्धि के सामर्थ्य अनुसार मैं मोटे तौर पर अमृतकाल के पंचामृत संकल्प को निम्न प्रकार देखता हूँ :

अपने पूर्वजों का पुण्य स्मरण :- जो राष्ट्र अपने पूर्वजों अपने महापुरुषों को भुला देता है राष्ट्र के रूप मे उसका अस्तित्व  ज्यादा समय तक बचा नहीं रह सकता  महापुरुषों का स्मरण न केवल वर्तमान पीढ़ी को अपने अतीत के गौरव से जोड़ता है बल्कि उनके द्वारा किए गए महान कार्यों और जीवन मूल्यों का पोषण भी भावी पीढ़ी मे करता है। भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां ऐसे तेजस्वी महापुरुषों की सबसे विस्तृत श्रृंखला रही है जिन्होने अपने जीवन मे अनगिनत कष्ठ सहकर तथा कीमते चुकाकर इस राष्ट्र के लिए सांस्कृतिकसामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन मूल्यों का निर्माण किया है  मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के कालखंड से लेकर आधुनिक स्वतन्त्रता संघर्ष के कालखंड तक के अपने पूर्वजों के स्मरण तथा गौरव से वर्तमान मे प्राप्त स्वराज का वास्तविक मोल प्रत्येक भारतीय ठीक से समझ सकेगा साथ ही इसे बचाए रखने का संकल्प भी और दृढ़ होता जाएगा 

महापुरुषों के अधूरे संकल्पों का भान :- केवल अपने महापुरुषों के स्मरण और गौरव मात्र से ही भारत के वैभव का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। भविष्य के परम वैभव सम्पन्न विकसित भारत का मार्ग अतीत के विश्वगुरु भारत के ज्ञान और अपने पूर्वजों के अधूरे संकल्पों को पूरा करने के उत्साह से ही प्रशस्त हो पाएगा  इसीलिए आजादी के 75 वर्ष का आनंद मनाने वाली पीढ़ी अपने महान पूर्वजों के इस राष्ट्र के लिए अधूरे संकल्पों को भी जाने यह आवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद का दरिद्र नारायण की सेवा का संकल्प हो चाहे महर्षि अरविंद के अखंड भारत की भविष्यवाणीसरदार पटेल का एक भारत श्रेष्ठ भारत का स्वप्न हो या आधुनिक तपस्वी अब्दुल कलाम का विजन 2020अपने महापुरुषों के अधूरे संकल्पों का भान इस युवा पीढ़ी को सटीक प्रकार से करवाना ताकि इन संकल्पों की पूर्ति की गति बढ़ सके।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की कविता की ये पंक्तियाँ भी अपने महान पूर्वजों के संकल्पों को पूरा करने की प्रेरणा हमे देती है :-

“पंद्रह अगस्त का दिन कहता आजादी अभी अधूरी है,

कुछ सपने सच होना बाकी है रावी की शपथ न पूरी है”

सनातन भारत के गौरव की झलक :- आजादी के अमृत महोत्सव की कल्पना मे सनातन भारत की झलक से क्या अभिप्राय हो सकता है जब इस दिशा मे देश का जनमानस सहज चिंतन करने लगता है तो अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के मस्तिष्क मे बैठाया गया वह भ्रम और झूठ की हम अंग्रेजों के आने के बाद एक राष्ट्र बनने लगे है (we are a nation in making ) स्वत: ही टूटकर चूर–चूर होने लगता है। हम अंग्रेजों की कृपा से एक राष्ट्र नहीं बने बल्कि विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र के रूप मे हमने जगत के कल्याण की कामना से मानव जीवन मूल्यों को सृजित किया है। कलाविज्ञानवास्तुयुद्ध शास्त्रविमान शास्त्र आदि सभी क्षेत्रों मे इस प्राचीन राष्ट्र की महान उपलब्धियां रही है अपने इस गौरवशाली अतीत पर गर्व की भावना के कमजोर होने के कारण ही हम हजारों वर्षों तक किसी न किसी विदेशी आक्रांताओं और बर्बर आक्रमणों के शिकार बनते रहे हैं  वास्तव मे इतने लंबे समय तक भीषण आक्रमणों से संघर्ष करते हुये भी हम अपने राष्ट्र को जीवित रखे हुये है यह वैश्विक आश्चर्य का कारण है इकबाल ने इसी आश्चर्य को अभिव्यक्त करते हुये कहा था की

“यूनान मिस्त्र रोम सब मिट गये जहाँ से

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा”

वह बात जिसके समाप्त होने से यूनान,मिस्त्र,रोम जैसे राष्ट्र समाप्त हो गये और जिसने एक राष्ट्र के रूप मे हमारी हस्ती को बचाए रखा वह है हमारी महान प्राचीन सनातन संस्कृति । आजादी के अमृत महोत्सव को मनाते हुये प्रत्येक भारतीय को भारत के सनातन स्वरूप से भी युक्त होने के लिए कृतसंकल्पित होना चाहिए इसी के स्वाभिमान से युक्त भारत विश्व पटल पर अपनी भूमिका निभा पाने मे सक्षम हो सकेगा 

आधुनिक भारत की चमक :- अन्तरिक्ष मे एक साथ सैकड़ो उपगृहों को स्थापित करना हो या सर्जिकल स्ट्राइक के रूप मे अपने शत्रुओं की माँद मे खुसकर जवाब देना होकोरोना महामारी से संघर्षरत विश्व के बीच स्वयं वेक्सिन का निर्माण हो चाहे ओलंपिक मे पदकों की चमक से अपने प्रदर्शन को ऐतिहासिक बनाना हो500 वर्षों से लंबित मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मंदिर का बनना हो चाहे भारत की अखंडता के मार्ग की रुकावट धारा 370 का हटना हो , सम्पूर्ण विश्व का योग के शरण मे आना हो चाहे भारत मे स्वच्छता का अभियान बन जाना हो , राजनीतिक स्वार्थों से इतर मुस्लिम बहिनो के सम्मान को अक्षुण्ण करने के लिए तीन तलाक को समाप्त करना हो या स्वतंत्र भारत मे पहली बार संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओपन डिबेट की अध्यक्षता करना इन सभी उदाहरणों से आधुनिक भारत की विश्वपटल पर प्रभावी झलक को प्रत्येक राष्ट्रभक्त सहज ही अनुभव करने लगा है । भारत को सम्पूर्ण विश्व अब किसी भी प्रकार से नजरंदाज नहीं कर सकता यह अनुभव होता दिखने लगा है | भारत की तरुनाई आगामी वर्षों अपनी प्रतिभा को और अधिक प्रखर कर विश्व पर आधुनिक भारत की चमक को तेज़ करेगी |

अपने स्व की स्पष्ठ समझ और उसका गौरव :- इस विषय पर तो संघ के पूजनीय सरसंघचालक जी का वर्ष २०२१ विजयादशमी का पूरा उद्बोधन सभी भारतीयों के लिए आवश्यक रूप से सुनने लायक है| कैसा मजाक हम स्वयं अपने साथ एक राष्ट्र के रूप में कर बैठे की स्वराज की प्राप्ति से पूर्व जो स्वदेशी का विचार एक हथियार के रूप में उपयोग किया स्वराज आने के बाद आज जब हम अपने इर्द गिर्द देखते है तो स्वदेशी का विचार अत्यंत हीन अवस्था में हमें मिलता है स्वराज के अमृत महोत्सव से प्रारंभ हुई अमृतकाल की इस यात्रा में फिर एक बार प्रत्येक भारतीय अपने स्व के गौरव से युक्त हो |अपनी भाषा,भूषा,खानपान,परम्पराएँ जो कुछ हमारा अपना है उसका गर्व करने के साथ उनको युगानुकुल बनाकर कर विश्व के कल्याण में सहभागी बनना साथ ही विश्वभर में जो कुछ अच्छा है उसे देशानुकुल कर स्वीकार करना | अपने देश का कुछ अच्छा नहीं ऐसे गुलामी के एक-एक अंश भारतीय चित्त से अब समाप्त होने चाहिए |

आवश्यकता है की अमृतकाल की यात्रा पर निकला भारत इन पंचामृत संकल्पों युक्त होकर अपने सनातन जीवन मूल्यों के स्वाभिमान से युक्त होकर अपनी शक्ति और सामर्थ्य को इस देश के लिए समर्पित करने की भूमिका मे आए ताकि शीघ्र ही अपने पूर्वजो के सपनों का परम वैभव सम्पन्न भारत बनते हुये अपने नेत्रों से देखने गौरव हमारी पीढ़ी को प्राप्त हो सकें।

भारत माता की जय

भूपेन्द्र उबाना
अजमेर राजस्थान 
 

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