Saturday, January 13, 2024

मकर संक्रांति

प्रकृति का मनुष्य जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है जिसे हमारे यहाँ  यत-पिण्डे तत-ब्रह्माण्डे कहा गया अर्थात जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस पिंड अर्थात हमारे शरीर के भीतर है | ब्रह्माण्ड में होने वाली घटनाओं का असर इस पिण्ड अर्थात मनुष्य शरीर पर भी होता है | प्रत्येक मनुष्य इन प्राकृतिक घटनाओं के प्रभावों के वैज्ञानिक पक्ष का चिंतन कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता इसीलिए प्राचीन भारतीय ऋषि- मुनियों ने इन घटनाओं को उत्सव रूप में समाज में प्रचलित किया |

ऐसे ही प्रमुख उत्सवों में से एक है मकर संक्रांति |यह पर्व हिन्दुओं  का प्रमुख पर्व है और इसे सम्पूर्ण भारत  और  नेपाल के सभी प्रान्तों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है।  उत्तर भारत में इस पर्व को 'मकर सक्रान्तिपंजाब में लोहडीगढ़वाल में खिचडी संक्रान्ति,गुजरात में उत्तरायणतमिलनाडु में पोंगलजबकि कर्नाटक,केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल  संक्रांति  कहते हैं। 

संक्रान्ति  का अर्थ है, 'सूर्य का एक राशि से अnगली राशि में संक्रमण (जाना)'। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति के बीच का समय ही सौर मास है। संक्रांति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है – “रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते”। इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल 12 संक्रान्तियां  होती हैं| पौष मास में सूर्य के नवम् धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण को मकर संक्रान्ति के रूप में जाना जाता है।

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व

 सामान्यतः सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैंकिन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। सर्वविदित है कि पृथ्वी की धुरी 23.5 अंश झुकी होने के कारण सूर्य छः माह पृथ्वी  के उत्तरी गोलार्द्ध के निकट होता है और शेष छः माह दक्षिणी गोलार्द्ध के निकट होता है।मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध के निकट होता है अर्थात् उत्तरी गोलार्ध से अपेक्षाकृत दूर होता है जिससे उत्तरी गोलार्ध में रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से उत्तरी गोलार्ध में रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा सर्दी की ठिठुरन कम होने लगती है। अतः मकर संक्रान्ति अन्धकार की कमी और प्रकाश की वृद्धि की शुरुआत है।

वास्तव में मनुष्य, प्राणी-जगत, वनस्पति-जगत सहित सभी जीवधारी प्रकाश चाहते हैं और मकर संक्रमण के साथ ही सम्पूर्ण संसार सुषुप्ति  से जाग्रति की ओर अग्रसर होता है। प्रकाश की अधिकता सभी प्राणियों की चेतना और कार्यशक्ति को बढ़ाने वाली होती है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना हैशीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। चरक संहिता स्पष्ट करती है-

शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनां बली।
रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति”

 इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेलतिल-गुड़गन्नाधूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं।

आयुर्वेद में तिल को कफ नाशकपुष्टिवर्धक और तीव्र असर कारक औषधि के रूप में जाना जाता है। यह स्वभाव से गर्म होता है इसलिए इसे सर्दियों में मिठाई के रूप में खाया जाता है। गजकरेवड़ियां  और लड्डू शीतऋतु में ऊष्मा प्रदान करते हैं। 

इस मौसम में सुबह का सूर्य का प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थ्य वर्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है । अतः पतंग उड़ाने का एक उद्देश्य कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना भी है।

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व

शास्त्रों के अनुसारदेवताओं के दिन की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है। दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है।

 भगवद् गीता के अध्याय ८ में भगवान कृष्ण कहते हैं कि उत्तरायण के छह माह में देह त्याग करने वाले ब्रह्म गति को प्राप्त होते हैं जबकि और दक्षिणायन के छह माह में देह त्याग करने वाले संसार में वापिस आकर जन्म मृत्यु को प्राप्त होते  हैं।

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ৷৷
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी  प्राप्य निवर्तते ৷৷
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया  यात्यनावृत्ति  मन्ययावर्तते  पुनः” ৷৷

       संभवत: सूर्य के उत्तरायण के इस महत्व के कारण ही भीष्म पितामह ने अपने प्राण तब तक नहीं छोड़ेजब तक मकर संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायन स्थिति नहीं आ गई ।रामचरित् मानस के बालकाण्ड में श्री राम के पतंग उड़ाने का वर्णन है-

'राम इक दिन चंग उड़ाईइन्द्र लोक में पहुंची जाई।'  

बड़ा ही रोचक प्रसंग है। पंपापुर से हनुमान जी को बुलवाया गया थातब हनुमान जी बाल रूप में थे। जब वे आएतब 'मकर संक्रांतिका पर्व थासंभवतः इसीलिए भारत के अनेक नगरों में मकर संक्रांति को पतंग उड़ाने की परम्परा है।

मकर संक्रांति का सामाजिक सन्देश 

प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और अंधकार अज्ञान का इसीलिए तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर काम,क्रोध,मद,मोह,अहंकार,ईर्ष्या,अज्ञान रूपी अंधकार के विविध रूपों पर संयम,प्रेम,विनम्रता,रूपी ज्ञान के प्रकाश से विजय पाने की प्रेरणा देने वाला है|

v     तिल का अपने आप में अस्तित्व लगभग नगण्य होता है लेकिन ये तिल गुड़ के साथ गुथ कर जब लड्डू का स्वरुप लेता है तो स्वाद के साथ उसकी शक्ति भी बढती है उसी प्रकार अलग–अलग जाति, मत, पंथ, सम्प्रदायों में विभक्त भारतीय समाज यदि शुद्ध राष्ट्रभक्ति रूपी गुड़ से आपस में संगठित रहता है तो विश्व की अजेय शक्ति (अजय्या च विश्वस्य) निर्मित हो सकेगी

v     महाराष्ट्र  में  इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रान्ति पर कपासतेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं - "लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला" अर्थात् तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो ।

v     इस दिन समाज में दान देने की परम्परा भी है जो सत्वगुण को व्यक्ति और समाज के भीतर जाग्रत करती है| पाश्चात्य जगत के प्रभाव में जहाँ चारों ओर स्वयं के भोग के लिए मांगने, आवश्यकता से अधिक एकत्र करने,संसाधनों पर एकाधिकार करने की मानसिकता संवेदनशील मानवता को निगलती दिखती है वहीँ मकर संक्रमण अपने प्राचीन आदर्श तेन त्यक्तेन भुंजीथा: अर्थात त्याग पूर्वक उपभोग को आज भी मानवता के हित में चिरजीवी बनाये हुए है |मकर संक्रांति न केवल भारत राष्ट्र का बल्कि सम्पूर्ण मानवता का उत्सव है। विश्व की 90% आबादी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ही निवास करती है अतः मकर संक्रांति पर्व न केवल भारत के लिए बल्कि लगभग पूरी मानव जाति के लिए उल्लास का दिन है। यद्यपि मकर संक्रांति सम्पूर्ण मानवता के उल्लास का पर्व है पर इसका उत्सव केवल हिन्दु समाज मनाता है क्योंकि भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व के मंगल और निरोग की कामना करता आया है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्

 

सब सुखी होंसब निरोग रहें। सब अच्छी घटनाओं को देखने वाले अर्थात् साक्षी रहें और कभी  किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े। वृहदारण्यक उपनिषद् के श्लोक के साथ आप सभी को मकर संक्रमण की हार्दिक शुभेच्छा ...

भूपेन्द्र उबाना

Thursday, November 17, 2022

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर बढ़ता भारत : हमारी भूमिका

 

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर बढ़ता भारत : हमारी भूमिका

भारत ने इस वर्ष अपना 75वां स्वाधीनता दिवस मनाया | सामान्यतया 75वी वर्षगांठ को हीरक जयंती के नाम से जाना जाता है लेकिन भारत सरकार ने अपने स्वराज के 75वे वर्ष के आयोजन को अमृत महोत्सव का नाम दिया है इसकी गहनता को प्रत्येक भारतीय ने समझना चाहिए |

अमृत क्या हैजिसे पाकर व्यक्ति अमर हो जाये, लेकिन जब हम स्वराज़ के अमृत महोत्सव की बात करते है तो हम इस सत्य को स्वीकार करते है की जिस प्रकार का स्वराज हमने 1947 में प्राप्त किया ऐसा स्वराज विगत 1000वर्षों में भारत कई बार प्राप्त किया और खोया | एक राष्ट्र के रूप में हम दुनिया की बर्बरतम और क्रूर जातियों से सतत संघर्ष किये और स्वराज पाए | शकों को परास्त कर विक्रमी संवत की स्थापना से लेकर मुगलों को धुल चटाकर शिवाजी द्वारा हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना करना ये सभी स्वराज की प्राप्ति के बारम्बार उदाहरण है किन्तु वह सत्य जिसे हम भूले या भुलाने के षड्यंत्र किये गए की हम बार-बार अपने स्वराज को खोये ही क्यों और वो क्या बाते हैं जो आज प्राप्त स्वराज को अमरत्व प्रदान करेगी....

अमृत महोत्सव से प्रारंभ हुई अगले  25वर्षों की इस यात्रा में जो भारत के अमृतकाल की यात्रा है वास्तव में प्रत्येक भारतीय के हृदय में उपरोक्त विमर्श को स्पष्टतः स्थापित करने पर ही अपना अभीष्ठ प्राप्त कर पायेगी |

संयोग से जिस समय भारत अपने स्वराज के अमृत महोत्सव से अमृतकाल की यात्रा में प्रवेश कर रहा है उसी समय भारत के परम वैभव के लक्ष्य को प्रतिदिन स्मरण करते हुए इसके लिए शक्ति संचय में लगा विचार भी २०२५ में शतायु होने जा रहा है | ऐसे समय में भारत को नेतृत्व देने वाले माननीय प्रधानमंत्री जी एवं संघ को नेतृत्व देने वाले पूजनीय सरसंघचालक जी उद्बोधनों से प्राप्त पाथेय भारत के वैभवपूर्ण अमृतकाल की इस यात्रा पर चलने वाले प्रत्येक राष्ट्रभक्त पथिक के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है |

इसलिए आवश्यकता है उनके द्वारा मिली सांकेतिक दिशा को समझने की और परम वैभव सम्पन्न भारत की चाह मे बढने वाले कदमों की गति को बढ़ाने की । विगत कुछ वर्षों में समय-समय पर दोनों मनुभावों द्वारा दिए गए भाषणों और उद्बोधनों से अमृतकाल में भारत के स्वराज और वैभव के लिए जिस अमृत की चाह हमें है उनके प्राकट्य के लिए आवश्यक बाते कही गयी है इनको ध्यान से सुनने के बाद मेरी बुद्धि के सामर्थ्य अनुसार मैं मोटे तौर पर अमृतकाल के पंचामृत संकल्प को निम्न प्रकार देखता हूँ :

अपने पूर्वजों का पुण्य स्मरण :- जो राष्ट्र अपने पूर्वजों अपने महापुरुषों को भुला देता है राष्ट्र के रूप मे उसका अस्तित्व  ज्यादा समय तक बचा नहीं रह सकता  महापुरुषों का स्मरण न केवल वर्तमान पीढ़ी को अपने अतीत के गौरव से जोड़ता है बल्कि उनके द्वारा किए गए महान कार्यों और जीवन मूल्यों का पोषण भी भावी पीढ़ी मे करता है। भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां ऐसे तेजस्वी महापुरुषों की सबसे विस्तृत श्रृंखला रही है जिन्होने अपने जीवन मे अनगिनत कष्ठ सहकर तथा कीमते चुकाकर इस राष्ट्र के लिए सांस्कृतिकसामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन मूल्यों का निर्माण किया है  मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के कालखंड से लेकर आधुनिक स्वतन्त्रता संघर्ष के कालखंड तक के अपने पूर्वजों के स्मरण तथा गौरव से वर्तमान मे प्राप्त स्वराज का वास्तविक मोल प्रत्येक भारतीय ठीक से समझ सकेगा साथ ही इसे बचाए रखने का संकल्प भी और दृढ़ होता जाएगा 

महापुरुषों के अधूरे संकल्पों का भान :- केवल अपने महापुरुषों के स्मरण और गौरव मात्र से ही भारत के वैभव का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। भविष्य के परम वैभव सम्पन्न विकसित भारत का मार्ग अतीत के विश्वगुरु भारत के ज्ञान और अपने पूर्वजों के अधूरे संकल्पों को पूरा करने के उत्साह से ही प्रशस्त हो पाएगा  इसीलिए आजादी के 75 वर्ष का आनंद मनाने वाली पीढ़ी अपने महान पूर्वजों के इस राष्ट्र के लिए अधूरे संकल्पों को भी जाने यह आवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद का दरिद्र नारायण की सेवा का संकल्प हो चाहे महर्षि अरविंद के अखंड भारत की भविष्यवाणीसरदार पटेल का एक भारत श्रेष्ठ भारत का स्वप्न हो या आधुनिक तपस्वी अब्दुल कलाम का विजन 2020अपने महापुरुषों के अधूरे संकल्पों का भान इस युवा पीढ़ी को सटीक प्रकार से करवाना ताकि इन संकल्पों की पूर्ति की गति बढ़ सके।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की कविता की ये पंक्तियाँ भी अपने महान पूर्वजों के संकल्पों को पूरा करने की प्रेरणा हमे देती है :-

“पंद्रह अगस्त का दिन कहता आजादी अभी अधूरी है,

कुछ सपने सच होना बाकी है रावी की शपथ न पूरी है”

सनातन भारत के गौरव की झलक :- आजादी के अमृत महोत्सव की कल्पना मे सनातन भारत की झलक से क्या अभिप्राय हो सकता है जब इस दिशा मे देश का जनमानस सहज चिंतन करने लगता है तो अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के मस्तिष्क मे बैठाया गया वह भ्रम और झूठ की हम अंग्रेजों के आने के बाद एक राष्ट्र बनने लगे है (we are a nation in making ) स्वत: ही टूटकर चूर–चूर होने लगता है। हम अंग्रेजों की कृपा से एक राष्ट्र नहीं बने बल्कि विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र के रूप मे हमने जगत के कल्याण की कामना से मानव जीवन मूल्यों को सृजित किया है। कलाविज्ञानवास्तुयुद्ध शास्त्रविमान शास्त्र आदि सभी क्षेत्रों मे इस प्राचीन राष्ट्र की महान उपलब्धियां रही है अपने इस गौरवशाली अतीत पर गर्व की भावना के कमजोर होने के कारण ही हम हजारों वर्षों तक किसी न किसी विदेशी आक्रांताओं और बर्बर आक्रमणों के शिकार बनते रहे हैं  वास्तव मे इतने लंबे समय तक भीषण आक्रमणों से संघर्ष करते हुये भी हम अपने राष्ट्र को जीवित रखे हुये है यह वैश्विक आश्चर्य का कारण है इकबाल ने इसी आश्चर्य को अभिव्यक्त करते हुये कहा था की

“यूनान मिस्त्र रोम सब मिट गये जहाँ से

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा”

वह बात जिसके समाप्त होने से यूनान,मिस्त्र,रोम जैसे राष्ट्र समाप्त हो गये और जिसने एक राष्ट्र के रूप मे हमारी हस्ती को बचाए रखा वह है हमारी महान प्राचीन सनातन संस्कृति । आजादी के अमृत महोत्सव को मनाते हुये प्रत्येक भारतीय को भारत के सनातन स्वरूप से भी युक्त होने के लिए कृतसंकल्पित होना चाहिए इसी के स्वाभिमान से युक्त भारत विश्व पटल पर अपनी भूमिका निभा पाने मे सक्षम हो सकेगा 

आधुनिक भारत की चमक :- अन्तरिक्ष मे एक साथ सैकड़ो उपगृहों को स्थापित करना हो या सर्जिकल स्ट्राइक के रूप मे अपने शत्रुओं की माँद मे खुसकर जवाब देना होकोरोना महामारी से संघर्षरत विश्व के बीच स्वयं वेक्सिन का निर्माण हो चाहे ओलंपिक मे पदकों की चमक से अपने प्रदर्शन को ऐतिहासिक बनाना हो500 वर्षों से लंबित मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मंदिर का बनना हो चाहे भारत की अखंडता के मार्ग की रुकावट धारा 370 का हटना हो , सम्पूर्ण विश्व का योग के शरण मे आना हो चाहे भारत मे स्वच्छता का अभियान बन जाना हो , राजनीतिक स्वार्थों से इतर मुस्लिम बहिनो के सम्मान को अक्षुण्ण करने के लिए तीन तलाक को समाप्त करना हो या स्वतंत्र भारत मे पहली बार संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओपन डिबेट की अध्यक्षता करना इन सभी उदाहरणों से आधुनिक भारत की विश्वपटल पर प्रभावी झलक को प्रत्येक राष्ट्रभक्त सहज ही अनुभव करने लगा है । भारत को सम्पूर्ण विश्व अब किसी भी प्रकार से नजरंदाज नहीं कर सकता यह अनुभव होता दिखने लगा है | भारत की तरुनाई आगामी वर्षों अपनी प्रतिभा को और अधिक प्रखर कर विश्व पर आधुनिक भारत की चमक को तेज़ करेगी |

अपने स्व की स्पष्ठ समझ और उसका गौरव :- इस विषय पर तो संघ के पूजनीय सरसंघचालक जी का वर्ष २०२१ विजयादशमी का पूरा उद्बोधन सभी भारतीयों के लिए आवश्यक रूप से सुनने लायक है| कैसा मजाक हम स्वयं अपने साथ एक राष्ट्र के रूप में कर बैठे की स्वराज की प्राप्ति से पूर्व जो स्वदेशी का विचार एक हथियार के रूप में उपयोग किया स्वराज आने के बाद आज जब हम अपने इर्द गिर्द देखते है तो स्वदेशी का विचार अत्यंत हीन अवस्था में हमें मिलता है स्वराज के अमृत महोत्सव से प्रारंभ हुई अमृतकाल की इस यात्रा में फिर एक बार प्रत्येक भारतीय अपने स्व के गौरव से युक्त हो |अपनी भाषा,भूषा,खानपान,परम्पराएँ जो कुछ हमारा अपना है उसका गर्व करने के साथ उनको युगानुकुल बनाकर कर विश्व के कल्याण में सहभागी बनना साथ ही विश्वभर में जो कुछ अच्छा है उसे देशानुकुल कर स्वीकार करना | अपने देश का कुछ अच्छा नहीं ऐसे गुलामी के एक-एक अंश भारतीय चित्त से अब समाप्त होने चाहिए |

आवश्यकता है की अमृतकाल की यात्रा पर निकला भारत इन पंचामृत संकल्पों युक्त होकर अपने सनातन जीवन मूल्यों के स्वाभिमान से युक्त होकर अपनी शक्ति और सामर्थ्य को इस देश के लिए समर्पित करने की भूमिका मे आए ताकि शीघ्र ही अपने पूर्वजो के सपनों का परम वैभव सम्पन्न भारत बनते हुये अपने नेत्रों से देखने गौरव हमारी पीढ़ी को प्राप्त हो सकें।

भारत माता की जय

भूपेन्द्र उबाना
अजमेर राजस्थान 
 

Saturday, October 6, 2018








दसों दिशाओं में जाएं दल बादल से छा जाएं
अनुभूति
 जनजाति क्षेत्रो में विद्या भारती चित्तोड़ प्रान्त की योजना से चलने वाले एकल विद्यालयों/संस्कार केंद्रों का अवलोकन करने के लिए दिनांक 4-5अक्टूबर को जाना हुआ।
डूंगरपुर जिले के सीमलवाड़ा क्षेत्र में पियोला गांव एक रात्रि बिताने के बाद हृदय का विश्वास दृढ़ हुआ है कि जहाँ एक ऒर विधर्मी अलगाववादी समाजकंटक हमारे भोले-भाले जनजाति समाज को बरगला कर अलगाव का अंधकार सर्वत्र फैलाने की चेष्ठा कर रहे है वही मा भारती के इन सच्चे उपासको द्वारा सैंकड़ो गांवों में संचालित यह सरस्वती शिक्षा केन्द्र नंदा दीप बनकर जल रहे हैं....
एक दिन में ही प्राप्त हुई अपने वनवासी बंधुओ की इतनी आत्मीयता,प्रेम,सत्कार ने हृदय हो आह्लादित कर दिया है...
स्वयं अभावों में रहकर भी अतिथि देवो भवः के मंत्र को अक्षरशः अनुभव किया है..
अंततः जब शिक्षा केंद्र की योजना से ही सैंकड़ो भील बंधुओ के बलिदान तीर्थ मानगढ़ पहुंचा..तो गुरु की स्थापित धूणी और मानगढ़ पर स्वतंत्रता की बलिवेदी पर आहूत हुए भील शहीदों की आत्माएं ...जैसे अपने सद्कार्यों की सफलता का आशीर्वाद देती अनुभव हुई..
वहीं गुरु द्वारा स्थापित सम्प सभा के उद्देश्य पढ़कर तो लगा मानो अपने सरस्वती शिक्षा केन्द्र गोविन्द गुरु की सम्प सभा का ही पुनर्जन्म हों...
जैसे जैसे वागड़ की उस पवित्र भूमि पर समय बीतता गया....संघ की शाखा पर गाये गीत की यह पंक्तिया मूर्त रूप में दृष्टिगत होने लगी..

दसों दिशाओं में जाएं,दल-बादल से छा जाएं,
उमड़-घुमड़ कर इस धरती को नंदन वन सा सरसायें
यह मत समझो किसी क्षेत्र को खाली रह जाने देंगे,
दानवता की बेल विषैली कहीं नही छाने देंगे,
जहाँ कहीं लू झुलसाती,हम नित रिमझिम बरसायें..
दसों दिशाओं में जाएं......💐

भूपेंद्र उबाना
प्रधानचार्य
आदर्श विद्या निकेतन माध्यमिक विद्यालय,
पुष्कर मार्ग अजमेर

Sunday, May 13, 2018

आहोम सेनापति लाचित

                    आहोम सेनापति लाचित
मुगल साम्राज्य की आंधियो में जब
सर्वदिक अंधकार छाया था
कुछ माटी के दीपों ने लड़कर
अंधकार मिटाया था...
ऐसा ही एक दीप पूर्वोत्तर की घंटियों में जला
जिसने अपने तप से पूर्वोत्तर का तम हरा
दीप सा होकर भी जिसका सामर्थ्य दिवाकर जैसा था
वो आहोम का बेटा लाचित-बिल्कुल ऐसा था.....

औरंगजेब की क्रूर आंखों ने,सपना देखा भारी
भारत को निगलने की थी पूरी तैयारी
राम नाम रखकर भी जो ,रावण के हाथों खेला
वो राजारामसिंह राजपूती शान पर लगा है दाग काला...

सन 1671 में सरायघाट के मैदानों में,मुगल भेड़िये आये थे,,
हाथीघोडे,तीरंदाज़,बंदूकची साथ लाये थे
सत्तर हजार की मुगल सेना से दो-दो हाथ किये आसामी वीरो ने
लाचित की तलवार का पानी फिर देखा मुगलिया हूरों ने...

कामरूप की धरती पर चण्डी का रूप छाया था
लाचित की तलवार ने जब,मुगलो पर कहर ढाया था
जान बचाकर मुगलिया सेना दूम दबाकर भागी
पाकर ऐसे बेटे को ब्रह्मपुत्र बनी बड़भागी...


भूपेन्द्र उबाना
अजयमेरु
राजस्थान

Tuesday, November 8, 2011

देश को एक खतरनाक कानून से बचाएं:"sampradayik avam lakshit hinsa adhiniyam 2011"

देश को एक खतरनाक कानून से बचाएं:    एक अलोकतांत्रिक, साम्प्रदायिक व
देश के बहुसंख्यक समाज के ऊपर दमनकारी कानून - 2011(‘Prevention of
Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations)
Bill,2011’) को जानें तथा एक व्यापक जन जागरण कर इसे संसद में पारित होने से रोकें-
  • इसमें माना है कि बहुसंख्यक समुदाय के सदस्य ही पैदा करते है।अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।
  • बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के खिलाफ किए गए सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय है, किंतु अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा बहुसंख्यकों के खिलाफ किए गए सांप्रदायिक अपराध दंडनीय नहीं है
  •  यदि किसी व्यक्ति के ऊपर घृणा संबंधी प्रचार का आरोप लगता है तो उसे तब तक एक पूर्वधारणा के अनुसार दोषी माना जाएगा जब तक वह निर्दोष नहीं सिद्ध हो जाता।
  •  शिकायतकर्ता पीडि़त का नाम और पहचान गुप्त रखी जाएगी। केस की प्रगति की रपट पुलिस शिकायतकर्ता को ही बताएगी।
  • हिन्दू महिला के साथ किए गए बलात्कार को अपराध नहीं मानता जबकि साम्प्रदायिक दंगों में हिन्दू महिला का शील ही विधर्मियों के निशाने पर रहता है।
  • अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि , बांग्लादेशी घुसपैठियों के निष्कासन की मांग करना, धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग करना भी अपराध बन जायेगा।
  • यदि प्रस्तावित बिल कानून बन जाता है तो केंद्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकारों को हड़प लेगी। विधेयक अगर पास हो जाता है तो हिन्दुओं का भारत में जीना दूभर हो जायेगा।
  • देश द्रोही और हिन्दू द्रोही तत्व खुलकर भारत और हिन्दू समाज को समाप्त करने का षडयन्त्र करते रहेंगे; परन्तु हिन्दू संगठन इनको रोकना तो दूर इनके विरुध्द आवाज भी नहीं उठा पायेंगे।
  • हिन्दू
  • जब अपने आप को कहीं से भी संरक्षित नहीं पायेगा तो धर्मान्तरण का कुचक्र तेजी से प्रारम्भ हो जायेगा।
  • इससे भी भयंकर स्थिति तब होगी जब सेना,पुलिस व प्रशासन इन अपराधियों को रोकने की जगह इनको संरक्षण देंगे औरइनके हाथ की कठपुतली बन देशभक्त हिन्दू संगठनों के विरुध्द कार्यवाही करने के लिए मजबूर हो जायेंगे।
  •                       is prakar ye prastavik vidheyak ki kewal jhalak matra hai. mul vidheyak me 8 adhyay or lagbhag 138 dharaye hai. adhiniyam ki pratyek dhara mugalo or britisho k kale kanun hi hai,,,, jise ye sarkar bharat per thop kar bharat k tukde tukde karne ka marg ek bar phir prashast kar rahi hai.
    ye bharat ka baccha baccha janta hai ki 1947 ko mili vibhajan ki  bhishan vibhishika ka karan kya tha. isi prakar alp-sankhyako k vishesh-adhikaro k naam per shuru huaa naatak aakhir me BHARAT VIBHAJAN ka karan bana. 
    Alp-sankhyako ko khush rakhne k chakkar me aaj ek bar phir congres naam ki is rakshasi manovrati ne vote bank ko banaye rakhne k liye BHARAT KI AKHANDTA ko daav per laga diya haiiiiiiiiii
                           Pure desh me sanghatit swar me is prastavik vidheyak ka jabardust virodh kar ise sansad me PASS HONA TO DUR PESH HONE SE BHI ROKNA HOGA. Bharat ki aakhandta ko bachaye or banaye rakhne k liye ye avashak hi nahi aniwarya ho gaya haiiiiiiii........ .........jogo or jagao................padho or padhao...............yaaro desh bachaoooooooo....

Saturday, November 5, 2011

chin ek rastriya sankat

1962 me aakraman kar k china ne bharat ki 38,000 varg km bhumi ko hathiya liya tha .......itna hi nahi wo bharat k arunachal pradesh per apna dava jatata raha hai durbhagya ki baat to ye hai ki bharat k hi kuch neta chin ki is ghranit soch ka samarthan karte najar aate hai.........
1962 me dhoka de chuka ye chini dragen aaj bhi aapni kartuto se bharat k liye sankat khada karne me laga h aaiye dekhe china ki kuch sankat paida karne wali gatividhiya..:_
arunachal me haliped banaya; 
china hamare padosi deso se senya sambandh bana kar bharat ko charo or se gherne ki taiyari me hai;
pakistan ne pok me 5183sq.km. bhumichina ko di jaha se usne karakoram haigway nikala tha.
pakistan{baluchisthan} me hi guvadar k bandargah perchina ne apna navi camp sthapit kiya hai.
Hind mahasagar me bhi chini sena ne panv pasarana shuru kar diya hai
Dusri or dekhe to purvi tat per myanmar{barma} k pure nadi parivahan tantra ko chini sena ne adhikrat kar rakha h.
Yahi myanmar me usne apna radar bhi sthapit kiya h jaha se vo bharat k sampurn purvi tat ki nigrani rakh sakega.
Nepal me maowaad k madhyam se waha ki sampurn rajniti ka sutradhar china hi ban gaya hai bharat me bhi lagbhag 150 jilo me isi prakar maowadi jaal bicha rahe hai.
kutnitik yudh
china pakisthan ko sashtrastro se sajjit kar raha hai
Antar-rastriya mancho per bharat ko aahat karne ki kutniti se china kaam kar raha hai
Bhramputra nadi per baandh banana shuru kar diya h china ne
Itna sab kuch hone k baad bhi ham bharatiyo ki bewakufi dehiye
aaj bharat-china antarastriya vyapaar 80 arab $ varshik hai
isme se 54 arab dolar yani lagbhag 2.5lakh carore ka hamara aayat{import} hai
badi matra me hamare yaha china ka maal bina bil k bhi milta ha use bhi agar jod liya jaye to ye aankada 3.5 lakh crore ho jayega
Is prakar hum bhartiya 3.5 lakh ka lagbhag 12% tex g.d.p. ka anupat mane to 40 hajar crore Rs.china sarkar ko rajasva k rup me dete hai
kul milakar kar china hamara hi juta hamare hi sar pe marne ki niti se kam kar raha hai hamare dwara prapt rajasv ka upyog wo hamare hi desk k khilaf samarik yojanaye banane me kar raha hai
kul milakar mitro aaj aavashakt hai china ki in rastra ghatak nitiyo ko samajhne ki or china nirmit sabhi vastuo k bhahiskar ki 
hamari jeb se chinis saman kharidne k liye nikala 1-1 paisa hamare desh k liye hi khatak hoga.....

मकर संक्रांति

प्रकृति का मनुष्य जीवन से घनिष्ठ   सम्बन्ध है जिसे हमारे यहाँ   यत - पिण्डे   तत - ब्रह्माण्डे  कहा गया अर्थात जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इ...